भारत में ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं जो आधुनिक विज्ञान और इंजीनियरिंग को चुनौती देते हैं। इन्हीं में से एक है आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित लेपाक्षी मंदिर (वीरभद्र मंदिर)। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'हवा में झूलता हुआ खंभा' (Hanging Pillar) है, जो बिना किसी जमीनी सहारे के सदियों से खड़ा है। आइए जानते हैं इस प्राचीन वास्तुकला के चमत्कार के पीछे का रहस्य।
1. मंदिर का गौरवशाली इतिहास
इस मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी (1530) में विजयनगर साम्राज्य के दौरान हुआ था। इसे विरुपन्ना और वीरन्ना नाम के दो भाइयों ने बनवाया था, जो राजा के दरबार में अधिकारी थे। यह मंदिर भगवान शिव के उग्र रूप 'वीरभद्र' को समर्पित है।2. हवा में झूलते खंभे का रहस्य
लेपाक्षी मंदिर में कुल 70 खंभे हैं। इनमें से एक खंभा जमीन को नहीं छूता है। यह खंभा छत से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसका निचला हिस्सा जमीन से लगभग आधा इंच ऊपर हवा में लटका है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु खंभे के नीचे से कपड़ा, रुमाल या कागज का टुकड़ा एक तरफ से दूसरी तरफ निकालते हैं। ऐसा करना शुभ माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस विशाल खंभे के हवा में होने के बावजूद पूरे मंदिर का संतुलन एकदम सटीक बना हुआ है।
3. जब ब्रिटिश इंजीनियर भी रह गए हैरान
अंग्रेजों के शासनकाल में एक ब्रिटिश इंजीनियर ने इस खंभे के रहस्य को जानने की कोशिश की थी। उसने यह पता लगाने के लिए कि खंभा पूरे मंदिर के वजन को कैसे संभालता है, उसे लोहे की रॉड से हिलाने का प्रयास किया।
जैसे ही उसने खंभे को थोड़ा खिसकाया, मंदिर की बाकी दीवारों और खंभों में दरारें आने लगीं। इससे यह साबित हो गया कि यह खंभा कोई वास्तुकला की गलती (Architectural Error) नहीं, बल्कि पूरे मंदिर के वजन को संतुलित करने के लिए बनाया गया एक मास्टरपीस है। डर के मारे इंजीनियर ने अपना शोध तुरंत रोक दिया।
4. वास्तुकला की अन्य विशेषताएं
लेपाक्षी मंदिर सिर्फ इस खंभे के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अन्य कलाकृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है: मंदिर से कुछ दूरी पर एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई (Monolithic) विशाल नंदी की मूर्ति है, जो भारत की सबसे बड़ी नंदी मूर्तियों में से एक है। मंदिर की छतों पर विजयनगर शैली की खूबसूरत पेंटिंग्स हैं, जो रामायण और महाभारत की कहानियों को दर्शाती हैं। मंदिर परिसर में एक विशाल पैर का निशान है, जिसे माता सीता या भगवान हनुमान का माना जाता है।
लेपाक्षी मंदिर का यह झूलता हुआ खंभा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि हमारे पूर्वजों का विज्ञान, गणित और वास्तुकला का ज्ञान आज के समय से कहीं अधिक उन्नत था। बिना किसी आधुनिक तकनीक के ऐसा संतुलन तैयार करना आज भी सिविल इंजीनियर्स के लिए एक पहेली बना हुआ है।

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