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| छठ पूजा की पौराणिक कथा |
छठ पूजा केवल लोक-आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि सनातन धर्म का एक ऐसा खगोलीय और आध्यात्मिक विज्ञान है जिसकी जड़ें हमारे प्राचीन ग्रंथों और भौगोलिक साक्ष्यों (Geographical Evidences) में बहुत गहरी हैं। इस ब्लॉग में हम सामान्य लोक-कथाओं से आगे बढ़कर, ग्रंथों के सटीक प्रमाणों, पुराणों और ऐतिहासिक स्थलों के साक्ष्यों के साथ यह समझेंगे कि कैसे त्रेतायुग में माता सीता और द्वापरयुग में द्रौपदी ने इस कठिन व्रत को पूर्ण किया था।
1. माता सीता द्वारा प्रथम छठ व्रत: 'आनंद रामायण' और 'मुंगेर सीता चरण'
सामान्यतः लोक-कथाओं में रामराज्य की स्थापना के समय सूर्य पूजा की बात कही जाती है, लेकिन इसका सबसे सटीक और लिखित प्रमाण 'आनंद रामायण' (वाल्मीकि रामायण का पूरक ग्रंथ) के उत्तरकांड में मिलता है।
ग्रंथ के अनुसार, लंका विजय के बाद प्रभु श्री राम पर लगे ब्रह्महत्या के पाप (रावण वध के कारण) के निवारण के लिए महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें राजसूय यज्ञ और आत्मशुद्धि की सलाह दी थी। इस दौरान वे ऋषि मुद्गल के आश्रम पहुंचे। ऋषि मुद्गल ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को माता सीता को सूर्य देव (भास्कर) और उनकी शक्ति (छठी मैया) की उपासना करने का विधान बताया।यह कथा केवल पन्नों तक सीमित नहीं है। बिहार के मुंगेर जिले में गंगा नदी के बीचों-बीच एक पहाड़ी पर स्थित मुद्गल ऋषि का आश्रम आज भी मौजूद है। इस स्थान को वर्तमान में सीता चरण के नाम से जाना जाता है। यहाँ एक चट्टान पर माता सीता के पैरों के प्राचीन निशान (पदचिह्न) मौजूद हैं, जिसके बारे में भारतीय पुरातत्व और स्थानीय इतिहासकार मानते हैं कि इसी स्थान पर बैठकर माता सीता ने जल में खड़े होकर पहला छठ व्रत संपन्न किया था।
वनपर्व के अनुसार, द्रौपदी के इस कठोर व्रत (निर्जला उपवास और जल अर्घ्य) से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने उन्हें 'अक्षय पात्र' प्रदान किया था। इस पात्र से पांडवों का खोया वैभव लौटा और कुरुक्षेत्र के युद्ध में उन्हें विजय प्राप्त हुई।
उत्तर प्रदेश के भगवानपुर कमला गांव के समीप देवखाल चौर को महाभारत कालीन लाक्षागृह कांड से जोड़ा जाता है। पौराणिक और पुरातात्विक मान्यताओं के अनुसार, लाक्षागृह की सुरंग से सुरक्षित निकलने के बाद कार्तिक मास में द्रौपदी ने इसी ऐतिहासिक घाट पर पवित्र जल में खड़े होकर छठ पूजा की थी, जो आज भी एक प्रमुख ऐतिहासिक तीर्थस्थल है।
2. द्रौपदी का छठ व्रत: 'महाभारत का वनपर्व' और 'देवखाल चौर'
महाभारत काल में पांडवों द्वारा सूर्य उपासना और द्रौपदी द्वारा लोक-कल्याण के लिए किए गए व्रत का उल्लेख बेहद प्रामाणिक है।
महाभारत के वनपर्व में विस्तृत उल्लेख है कि जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर 12 वर्ष के वनवास पर थे, तब उनके साथ हजारों ब्राह्मण और प्रजा भी भूखी वन में भटक रही थी। द्रौपदी अन्नपूर्णा स्वरूप थीं, पर संसाधनों की कमी से व्याकुल थीं। तब पांडवों के पुरोहित महर्षि धौम्य ने उन्हें 'सूर्य षष्ठी' (छठ व्रत) का महत्व बताया।वनपर्व के अनुसार, द्रौपदी के इस कठोर व्रत (निर्जला उपवास और जल अर्घ्य) से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने उन्हें 'अक्षय पात्र' प्रदान किया था। इस पात्र से पांडवों का खोया वैभव लौटा और कुरुक्षेत्र के युद्ध में उन्हें विजय प्राप्त हुई।
उत्तर प्रदेश के भगवानपुर कमला गांव के समीप देवखाल चौर को महाभारत कालीन लाक्षागृह कांड से जोड़ा जाता है। पौराणिक और पुरातात्विक मान्यताओं के अनुसार, लाक्षागृह की सुरंग से सुरक्षित निकलने के बाद कार्तिक मास में द्रौपदी ने इसी ऐतिहासिक घाट पर पवित्र जल में खड़े होकर छठ पूजा की थी, जो आज भी एक प्रमुख ऐतिहासिक तीर्थस्थल है।
3. सूर्यपुत्र कर्ण और अंग देश (भागलपुर)
छठ पूजा में नदी के पानी में खड़े होकर अर्घ्य देने की जो पद्धति आज हम देखते हैं, उसका सीधा ऐतिहासिक संबंध महाभारत के महादानी अंगराज कर्ण से है।
महाभारत में दुर्योधन ने कर्ण को 'अंग देश' का राजा बनाया था, जिसका क्षेत्र वर्तमान बिहार का भागलपुर और मुंगेर का इलाका है।कर्ण प्रतिदिन नियम से गंगा नदी के पानी में अपनी कमर तक डूबकर सूर्य देव की उपासना करते थे और अर्घ्य देते थे। चूंकि यह क्षेत्र आज के आधुनिक बिहार का केंद्र है, इसलिए ऐतिहासिक रूप से यही वह मुख्य कारण है जिसके कारण छठ पूजा की निरंतरता और इसकी सबसे कठोर पद्धतियां (पानी में घंटों खड़े रहना) सदियों से इस क्षेत्र की संस्कृति का अटूट हिस्सा बनी रहीं।
4. 'ब्रह्मवैवर्त पुराण': कौन हैं छठी मैया?
अक्सर लोग संशय में रहते हैं कि सूर्य पूजा के साथ 'छठी मैया' कौन हैं? इसका लिखित साक्ष्य हमें 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के प्रकृति खंड में मिलता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की, तो उन्होंने मूल प्रकृति को कई अंशों में विभाजित किया। प्रकृति के छठे अंश (Sixth Part) को 'देवसेना' कहा गया है, जिन्हें आम बोलचाल में 'छठी मैया' या 'षष्ठी देवी' कहा जाता है। ये भगवान कार्तिकेय की मानस पत्नी हैं और शिशुओं व संतानों की रक्षा करने वाली मूल चेतना हैं। यही कारण है कि छठ व्रत का संकल्प संतान की दीर्घायु और कुल की रक्षा के लिए लिया जाता है।
वैज्ञानिक साक्ष्य (Scientific Evidence): 'फोटो-बायो-मॉड्यूलेशन' का सिद्धांत
प्राचीन ऋषियों ने इस व्रत को कार्तिक मास में ही क्यों रखा? इसके पीछे खगोलीय और शारीरिक विज्ञान (Chrono-biology) काम करता है:
- कार्तिक षष्ठी का खगोलीय महत्व: शरद ऋतु के इस समय पृथ्वी सूर्य के एक विशेष कोण पर होती है। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें (UV Rays) वातावरण में छनकर आती हैं और हानिकारक नहीं होतीं।
- जल और सौर ऊर्जा का संयोजन (Solar-Water Therapy): जब व्रती नदी के पानी में खड़े होकर तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो पानी की धार से छनकर आने वाली सूर्य की किरणें आँखों के रास्ते पीनियल ग्रंथि (Pineal Glimpse) को सक्रिय करती हैं। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है और मानसिक तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
आनंद रामायण से लेकर महाभारत के वनपर्व तक और मुंगेर के सीता चरण से लेकर देवखाल चौर तक—हर एक साक्ष्य यह प्रमाणित करता है कि छठ पूजा कोई सामान्य क्षेत्रीय त्योहार नहीं है। यह सनातन संस्कृति का सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और प्रामाणिक प्रकृति-सम्मत महापर्व है, जो हमें सिखाता है कि जो ढलता है, उसका उदय भी निश्चित है।
छठ महापर्व का इतिहास और पौराणिक साक्ष्य: (FAQs)
प्रश्न 1: माता सीता ने सबसे पहले किस स्थान पर छठ पूजा की थी और इसका क्या प्रमाण है?
- उत्तर: पौराणिक मान्यताओं और 'आनंद रामायण' के अनुसार, माता सीता ने बिहार के मुंगेर जिले में गंगा नदी के तट पर पहला छठ व्रत किया था। यहाँ आज भी पहाड़ी पर स्थित 'सीता चरण मंदिर' में उनके प्राचीन पदचिह्न मौजूद हैं, जो इस ऐतिहासिक घटना का मुख्य भौगोलिक साक्ष्य है।
प्रश्न 2: महाभारत काल में द्रौपदी ने छठ व्रत क्यों रखा था?
- उत्तर: जब पांडव अपना राज-पाठ हारकर 12 वर्ष के वनवास पर थे, तब महर्षि धौम्य की सलाह पर द्रौपदी ने पांडवों के संकट दूर करने और खोया वैभव वापस पाने के लिए सूर्य षष्ठी (छठ) का कठिन व्रत रखा था। इस व्रत के पुण्य से उन्हें 'अक्षय पात्र' प्राप्त हुआ था।
प्रश्न 3: क्या छठ पूजा का उल्लेख वेदों या पुराणों में मिलता है?
- उत्तर: हाँ, ऋग्वेद में सूर्य उपासना और उषा (छठी मैया) की स्तुति के मंत्र मिलते हैं। इसके अलावा, 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के प्रकृति खंड में माता षष्ठी (छठी मैया) की उत्पत्ति और राजा प्रियव्रत द्वारा इस व्रत को शुरू करने का स्पष्ट और प्रामाणिक लिखित साक्ष्य मिलता है।
प्रश्न 4: अंगराज कर्ण का छठ पूजा की परंपरा से क्या संबंध है?
- उत्तर: महाभारत के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण आधुनिक बिहार के भागलपुर-मुंगेर (अंग देश) के राजा थे। वे प्रतिदिन घंटों गंगा नदी के पानी में कमर तक खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। नदी के जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की यही कठिन पद्धति आज छठ पूजा का मुख्य आधार है।
प्रश्न 5: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कार्तिक मास में ही छठ पूजा क्यों की जाती है?
- उत्तर: वैज्ञानिक रूप से, शरद ऋतु (कार्तिक मास) के समय पृथ्वी पर सूर्य की किरणें एक विशेष कोण से आती हैं, जिससे पराबैंगनी किरणें (UV Rays) हानिकारक नहीं होतीं। पानी में खड़े होकर तांबे के पात्र से अर्घ्य देने पर छनकर आने वाली रोशनी आँखों और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाती है।

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