सदियों पहले लिखे गए साहित्य में आधुनिक विज्ञान की झलक मिलना सनातन धर्म की महानता को दर्शाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा की यह चौपाई इसका सबसे सटीक उदाहरण है। इस चौपाई में पृथ्वी से सूर्य की दूरी का जो आकलन मिलता है, वह आधुनिक विज्ञान (NASA) के आँकड़ों के बिल्कुल समान है। या हम यह कह सकते हैं कि नासा के इन आँकड़ों का आधार यह चोपाई है।
आइए समझते हैं इस चौपाई के पीछे छिपे गणित को।
मुख्य चौपाई
"जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥"
तुलसीदास जी ने इस चौपाई में बताया है कि- हनुमान जी ने एक युग, सहस्र और योजन की दूरी पर स्थित भानु (सूर्य) को मीठा फल समझकर निगल लिया था।
दूरी की गणना (वैदिक गणितीय विश्लेषण)
इस चौपाई के पहले चार शब्द "जुग, सहस्र, जोजन, पर भानु" ही सूर्य की दूरी का पूरा गणित समझा देते हैं। वैदिक काल और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इन शब्दों का संख्यात्मक मान इस प्रकार है:
1. जुग (युग)
वैदिक काल चक्र के अनुसार चार मुख्य युग होते हैं, जिनके वर्षों की संख्या इस प्रकार है:
- सत्ययुग: 4,800 दिव्य वर्ष
- त्रेतायुग: 3,600 दिव्य वर्ष
- द्वापरयुग: 2,400 दिव्य वर्ष
- कलयुग: 1,200 दिव्य वर्ष
इन सब का योग करने पर 12,000 वर्ष (जुग) प्राप्त होता है।
2. सहस्र
- सहस्र का सीधा और स्पष्ट अर्थ होता है: 1,000
3. जोजन (योजन)
- प्राचीन भारत में योजन दूरी मापने की एक इकाई थी।
- 1 योजन = 8 मील (Mile) के बराबर होता है।
अंतिम समीकरण और कुल दूरी
तुलसीदास जी के शब्दों के अनुसार, इन तीनों इकाइयों का आपस में गुणा करने पर सूर्य की दूरी निकलती है:
=12,000 X 1,000 X 8 Mile
=96,000,000 Mile
किलोमीटर में परिवर्तन:
चूंकि 1 मील में लगभग 1.609 किलोमीटर होते हैं:
(96,000,000 X 1.609=154,464,000)
अर्थात, हनुमान चालीसा के अनुसार सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ 44 लाख किलोमीटर है।
आधुनिक विज्ञान बनाम हनुमान चालीसा
वैज्ञानिकों और टेलिस्कोप के बिना, 16वीं सदी में तुलसीदास जी द्वारा लिखा गया यह आँकड़ा आज के विज्ञान को हैरान करता है:
- आधुनिक विज्ञान (NASA) के अनुसार: पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी लगभग 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर (93,000,000 मील) है। चूंकि पृथ्वी की कक्षा अंडाकार है, यह दूरी अधिकतम 15 करोड़ 20 लाख किमी तक जाती है।
- तुलसीदास जी का गणित: लगभग 15 करोड़ 44 लाख किलोमीटर।
यह अंतर इतना मामूली है कि इसे प्राचीन काल की गणना पद्धतियों की अचूकता का प्रमाण माना जा सकता है।
हनुमान चालीसा की यह चौपाई केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है। यह इस बात का जीवित प्रमाण है कि प्राचीन भारत का खगोल विज्ञान (Astronomy) और गणित कितना उन्नत था। जिस दूरी को मापने में आधुनिक विज्ञान को सदियों लग गए, उसे हमारे संतों ने काव्य की एक साधारण पंक्ति में पिरो दिया था।

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