"जय गणेश जय गणेश देवा" आरती हम बचपन से हर शुभ कार्य में गाते आ रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस आरती को किसने लिखा था और इसमें भगवान गणेश के स्वरूप के पीछे कौन सा गहरा मानसिक और वैज्ञानिक संदेश छिपा है? आइए जानते हैं इस प्रसिद्ध आरती का वास्तविक अर्थ और पूजा की सही विधि।
जय गणेश जय गणेश देवा ( lyrics ): श्री गणेश जी की आरती
🎼 मूल आरती पाठ " ॐ श्री गणेशाय नमः "
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूस की सवारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
अन्धे को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
" ॐ श्री गणेशाय नमः "
🔍 इस आरती के पीछे छिपा गहरा अर्थ और रहस्य
यह आरती केवल एक भक्ति गीत नहीं है, बल्कि इसके हर शब्द में गहरा आध्यात्मिक संदेश और जीवन का दर्शन छिपा हुआ है:
1. स्वरूप का वैज्ञानिक और मानसिक महत्व
- एकदन्त (एक दांत): यह जीवन में एकाग्रता (Focus) को दर्शाता है। यह संदेश देता है कि हमें अच्छी चीजों को स्वीकार करना चाहिए और बुरी चीजों को त्याग देना चाहिए।
- चार भुजाधारी: यह मनुष्य के चार पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है।
- मूस (चूहा) की सवारी: चूहा हमारे चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक है। गणेश जी का चूहे पर बैठना यह दिखाता है कि हमें अपनी इच्छाओं और चंचलता पर नियंत्रण (Control) रखना चाहिए।
2. 'सूर' श्याम का रहस्य
आरती की अंतिम पंक्तियों में "'सूर' श्याम शरण आए" आता है। कई लोग इसे 'सुर' (देवता) समझ लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह महान कवि सूरदास जी के नाम की छाप है। उन्होंने ही भगवान गणेश की स्तुति में इस अद्भुत आरती की रचना की थी।
3. सामाजिक और मानवीय संदेश
आरती की पंक्तियाँ—"अन्धे को आँख देत, कोढ़िन को काया..." यह दर्शाती हैं कि भगवान गणेश की कृपा केवल धन-दौलत तक सीमित नहीं है। यह शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक दुखों को दूर कर जीवन में पूर्णता लाती है।
🔱 आरती करने की सही विधि और नियम
गणेश जी की आरती करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है:
- प्रथम पूज्य: सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य, पूजा या अनुष्ठान से पहले इस आरती को गाना अनिवार्य माना गया है क्योंकि गणेश जी प्रथम पूज्य देव हैं।
- भोग की दिशा: आरती के समय गणेश जी को मोदक या बूंदी के लड्डू का भोग अवश्य लगाएं।
- दुर्वा का महत्व: पूजा में 21 या 5 दुर्वा (हरी घास) गणेश जी के मस्तक पर अर्पित करें।
- आरती की दिशा: दीपक को हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) घुमाते हुए आरती करें।
" ॐ श्री गणेशाय नमः "

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