जब संध्या समय मंदिरों में घंटियों की गूंज के साथ कपूर की खुशबू हवा में तैरती है, तब एक चिर-परिचित मधुर धुन हर सनातनी के दिल को छू जाती है—"ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा..."।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह सिर्फ एक पारंपरिक वंदना नहीं है? महान संत स्वामी शिवानंद जी द्वारा रचित यह आरती वास्तव में सनातन दर्शन (फिलोसोफी) का एक ऐसा निचोड़ है, जिसे संगीत के धागे में पिरोया गया है। रोज़ गाई जाने वाली इन चंद पंक्तियों में सृष्टि के निर्माण, ईश्वर के स्वरूप और जीवन के परम सत्य का गहरा रहस्य छिपा है।
नीचे संपूर्ण शिव आरती दी गई है, जिसे आप नियमित पूजा या महाशिवरात्रि के दिन गा सकते हैं:
ॐ जय शिव ओंकारा आरती लिरिक्स (Om Jai Shiv Omkara Aarti Lyrics in Hindi)
शिवजी की आरती ( Shiv Ji Ki Aarti )
'ॐ जय शिव ओंकारा' | Om Jai Shiv Omkara
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा..."।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥
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आइए इस कालजयी आरती के पंक्तियों के पीछे छिपे अनूठे आध्यात्मिक संदेश को डिकोड करते हैं।
1. त्रिदेवों की एकता का महाघोष
अक्सर लोग भ्रमित रहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश अलग-अलग शक्तियों के प्रतीक हैं। यह आरती शुरुआत में ही इस भ्रम को तोड़ती है:
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
गहरा अर्थ:
यहाँ बताया गया है कि ब्रह्मा (सृष्टि की रचना करने वाले), विष्णु (सृष्टि का पालन करने वाले) और सदाशिव (परम निराकार चेतना) वास्तव में एक ही हैं। 'अर्द्धांगी धारा' शब्द शिव और शक्ति (नारी और पुरुष ऊर्जा) के संतुलन को दिखाता है। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि पैदा होना, जीना और विलीन हो जाना—ये सब एक ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अलग-अलग रूप हैं।
यहाँ बताया गया है कि ब्रह्मा (सृष्टि की रचना करने वाले), विष्णु (सृष्टि का पालन करने वाले) और सदाशिव (परम निराकार चेतना) वास्तव में एक ही हैं। 'अर्द्धांगी धारा' शब्द शिव और शक्ति (नारी और पुरुष ऊर्जा) के संतुलन को दिखाता है। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि पैदा होना, जीना और विलीन हो जाना—ये सब एक ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अलग-अलग रूप हैं।
2. एकानन, चतुरानन, पंचानन: चेतना का विकास
आरती की गति जैसे ही बढ़ती है, ईश्वर के विविध रूपों और उनके वाहनों का एक अनूठा विवरण सामने आता है:
एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥
गहरा अर्थ:
- एकानन / गरुड़ासन: यहाँ भगवान विष्णु का संकेत है, जो गरुड़ (दूरदर्शिता और तीक्ष्ण बुद्धि के प्रतीक) पर सवार हैं।
- चतुरानन / हंसासन: यहाँ ब्रह्मा जी का वर्णन है, जो हंस (विवेक के प्रतीक, जो दूध और पानी को अलग कर देता है) पर बैठते हैं।
- पंचानन / वृषवाहन: यह महादेव का स्वरूप है। पाँच मुख प्रकृति के पाँच तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का प्रतीक हैं। उनका वाहन नंदी (बैल) अचल निष्ठा और शक्ति का प्रतीक है।
इन सब को एक साथ रखकर आरती हमें समझाती है कि पूरी भौतिक सृष्टि और प्रकृति के नियम इसी एक ईश्वर के भीतर समाए हैं।
3. त्रिगुण रूप: प्रकृति की तीन डोरियों से ऊपर
इस आरती की सबसे अद्भुत और दार्शनिक पंक्ति वह है, जो मानव स्वभाव और संसार के ताने-बाने को समझाती है:
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे ।
त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥
गहरा अर्थ:
शिव दो भुजाओं वाले योगी हैं, विष्णु चार भुजाओं वाले चक्रधारी हैं, और माँ दुर्गा या महाकाली दस भुजाओं वाली शक्ति हैं। जब तीनों लोकों के जीव इस संयुक्त रूप को देखते हैं, तो वे त्रिगुण रूप के दर्शन करते हैं। ये तीन गुण हैं:
शिव दो भुजाओं वाले योगी हैं, विष्णु चार भुजाओं वाले चक्रधारी हैं, और माँ दुर्गा या महाकाली दस भुजाओं वाली शक्ति हैं। जब तीनों लोकों के जीव इस संयुक्त रूप को देखते हैं, तो वे त्रिगुण रूप के दर्शन करते हैं। ये तीन गुण हैं:
- सत्व (Sattva): पवित्रता, शांति और ज्ञान।
- रजस (Rajas): इच्छाएं, ऊर्जा और कर्म।
- तमस (Tamas): अंधकार, आलस्य और विनाश।
इस पंक्ति को गाते हुए हम खुद को याद दिलाते हैं कि भले ही हमारा जीवन इन तीनों गुणों के उतार-चढ़ाव में फंसा हो, लेकिन महादेव इन सब से परे हैं। उनकी शरण में आने से हमारे भीतर भी एक मानसिक संतुलन पैदा होता है।
4. वैराग्य और ऐश्वर्य का अनोखा संतुलन
आगे की पंक्तियों में ईश्वर के वस्त्रों और श्रृंगार का ऐसा वर्णन है जो हमें जीवन जीने की कला सिखाता है:
अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी ।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ॥
गहरा अर्थ:
एक तरफ भगवान विष्णु हैं जो वनमाला (सुंदर फूलों की माला) और पीताम्बर (पीले रेशमी वस्त्र) पहनकर संसार के उत्सव और सुंदरता को मनाते हैं। दूसरी तरफ शिव हैं जो मुंडमाला (खोपड़ियों की माला) और बाघम्बर (बाघ की छाल) धारण कर परम वैराग्य को दर्शाते हैं।
एक तरफ भगवान विष्णु हैं जो वनमाला (सुंदर फूलों की माला) और पीताम्बर (पीले रेशमी वस्त्र) पहनकर संसार के उत्सव और सुंदरता को मनाते हैं। दूसरी तरफ शिव हैं जो मुंडमाला (खोपड़ियों की माला) और बाघम्बर (बाघ की छाल) धारण कर परम वैराग्य को दर्शाते हैं।
यह दृश्य जीवन के सबसे बड़े सच 'संतुलन' को दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए दुनिया की सुंदरता का आनंद भी लें (विष्णु रूप), लेकिन भीतर से हमेशा इस बात के प्रति जागरूक रहें कि सब कुछ नश्वर है, एक दिन सब मिट्टी में मिलना है (शिव रूप)।
आरती का वास्तविक सार क्या है?
'आरती' शब्द संस्कृत के 'आरात्रिक' से आया है, जिसका अर्थ होता है—जो अंधकार को पूरी तरह दूर कर दे।
जब हम "ॐ जय शिव ओंकारा" गाते हुए दीये की लौ को घुमाते हैं, तो वह लौ हमारी आत्मा का प्रतीक होती है। जैसे कपूर जलकर बिना कोई राख छोड़े पूरी तरह गायब हो जाता है, वैसे ही आरती गाते समय हमारा अहंकार भी पूरी तरह गल जाना चाहिए।
जब आप इस आरती को सुनते या गाते हैं, तो आपको इसके संगीत में ज्यादा शांति मिलती है या इसके शब्दों के गहरे अर्थ में? अपनी पसंदीदा पंक्ति नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें!
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