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| हरितालिका तीज: मूर्ति स्थापना और संपूर्ण पूजा विधि |
सनातन धर्म में नारी शक्ति और उनके अखंड सौभाग्य का प्रतीक हरितालिका तीज (Hartalika Teej) का व्रत सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण, त्याग और अटूट विश्वास की पराकाष्ठा है।
इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए, और अविवाहित कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। हरितालिका तीज की पूजा का सबसे मुख्य केंद्र होता है—अपने हाथों से बनाई गई मिट्टी की मूर्तियां।
आइए जानते हैं कि इस पावन अवसर पर माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति की स्थापना और पूजा संपूर्ण विधि-विधान से कैसे करें, ताकि आपकी हर मनोकामना पूरी हो।
मिट्टी की मूर्तियों का आध्यात्मिक महत्व (The Spiritual Essence of Clay Idols)
शास्त्रों के अनुसार, हरितालिका तीज के दिन बाजार की रेडीमेड मूर्तियों के बजाय अपने हाथों से पवित्र मिट्टी (गंगाजल मिश्रित बालू या शुद्ध मिट्टी) से शिव परिवार की मूर्ति बनाने का विशेष महत्व है।
इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक कारण है:
- माता पार्वती का मूल स्वरूप: माता पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए गंगा तट पर बालू (रेत) से शिवलिंग और मूर्तियों का निर्माण किया था। जब हम अपने हाथों से मिट्टी की मूरत गढ़ते हैं, तो हम माता पार्वती के उसी तपोमय भाव से जुड़ते हैं।
- तत्व शुद्धि: मिट्टी (पृथ्वी तत्व) को सृष्टि का मूल माना गया है। हाथों से बनी मिट्टी की मूर्ति में साधक की सकारात्मक ऊर्जा और श्रद्धा समाहित हो जाती है, जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।
पूजा से पहले की तैयारी: सामग्री सूची (Pooja Samagri)
पूजा शुरू करने से पहले इन आवश्यक सामग्रियों को एक स्थान पर एकत्रित कर लें:
- मूर्तियां बनाने के लिए: साफ मिट्टी या बालू रेत, गंगाजल।
- वेदी और आसन: एक सुंदर लकड़ी की चौकी, पीला या लाल कपड़ा, केले के पत्ते, कलश (तांबे या मिट्टी का), नारियल, आम के पत्ते।
- माता पार्वती के लिए सुहाग पिटारी (सोलह श्रृंगार): कुमकुम, मेहंदी, सिंदूर, काजल, बिंदी, चूड़ियाँ, बिछिया, महावर (अलता), कंघी, और एक सुंदर साड़ी या चुनरी।
- भगवान शिव के लिए वस्त्र और पूजन सामग्री: धोती या पीला कपड़ा, जनेऊ, चंदन, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग, शमी के पत्ते।
- अन्य सामग्रियां: अक्षत (बिना टूटे चावल), धूप, दीप (शुद्ध घी का), कपूर, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी), मौली (कलावा), और ऋतु फल (विशेषकर केला, सेब, अनार)।
यदि आपके पास पूजा की सामग्री जुटाने का समय नहीं है, तो आप पूरी शुद्धता से तैयार की गई Hartalika Teej Puja Kit क्लिक करके सीधे मँगा सकते हैं।
मूर्ति स्थापना और संपूर्ण पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
हरितालिका तीज की पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद और रात्रि के शुरुआती पहर) में करना सबसे उत्तम माना जाता है।
1. मूर्तियों का निर्माण और चौकी सजाना
- सबसे पहले शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की सुंदर मूर्तियां बनाएं। रिद्धि-सिद्धि के प्रतीक स्वरूप गणेश जी को हमेशा शिव-पार्वती के दाहिनी ओर रखें।
- पूजा स्थल को साफ करके वहां लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
- चौकी के चारों कोनों पर केले के पत्ते के खंभे लगाएं और एक सुंदर मंडप तैयार करें।
- चौकी पर अष्टदल कमल (चावल से) बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और ऊपर नारियल स्थापित करें।
2. संकल्प और प्राण प्रतिष्ठा
- हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप पूरी निष्ठा के साथ इस व्रत को कर रही हैं।
- इसके बाद मूर्तियों पर गंगाजल छिड़ककर उन्हें चौकी पर केले के पत्ते के आसन पर विराजमान करें। भाव करें कि भगवान शिव और माता पार्वती साक्षात वहां पधार चुके हैं।
3. महादेव और गणेश जी का पूजन
- सबसे पहले प्रथम पूजनीय श्री गणेश जी का तिलक करें, उन्हें दूर्वा और मोदक अर्पित करें।
- इसके बाद भगवान शिव को पंचामृत से प्रतीकात्मक स्नान कराएं (मिट्टी की मूर्ति होने के कारण केवल जल के छींटे दें या सामने एक सुपारी रखकर उस पर स्नान कराएं)।
- शिव जी को चंदन का त्रिपुंड लगाएं, जनेऊ पहनाएं और उनके प्रिय बेलपत्र, धतूरा, शमी पत्र और आक के फूल अर्पित करें।
4. माता पार्वती का महा-श्रृंगार (अखंड सौभाग्य की प्राप्ति)
- माता पार्वती को कुमकुम, हल्दी और अक्षत चढ़ाएं।
- अब सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान करें: सुहाग की सामग्री अर्पित करना। माता को सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियाँ और चुनरी अर्पित करें।
- विशेष टिप: माता को चढ़ाए गए सिंदूर में से थोड़ा सा सिंदूर बचाकर रख लें। पूजा के बाद इसे अपनी मांग में लगाएं, इसे माता का परम आशीर्वाद माना जाता है।
5. हरितालिका तीज व्रत कथा और आरती
- धूप और दीप जलाकर बैठ जाएं और शांत चित्त से हरितालिका तीज की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा के दौरान हाथ में अक्षत और फूल रखें, जो कथा समाप्त होने पर भगवान के चरणों में अर्पित कर दें।
- कथा के बाद माता पार्वती और भगवान शिव की कपूर से आरती करें।
रात्रि जागरण का नियम और पारण (Night Vigil and Parana)
हरितालिका तीज का व्रत केवल दिन तक सीमित नहीं रहता। शास्त्रों के अनुसार, इस रात सोए बिना रात्रि जागरण करने का विधान है।
- रात के चारों प्रहरों में भगवान शिव और पार्वती की विशेष आरती और भजन-कीर्तन किए जाते हैं।
- अगले दिन सुबह (चतुर्थी तिथि को): सुबह उठकर स्नान करें, माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं और ककड़ी या हलवे का भोग लगाएं।
- इसके बाद किसी सुहागिन महिला या ब्राह्मण को सुहाग की सामग्री और दान-दक्षिणा दें।
- अंत में, मिट्टी की मूर्तियों को किसी पवित्र नदी, तालाब या घर के ही किसी गमले में आदरपूर्वक विसर्जित करें। विसर्जन के बाद ही जल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
हरितालिका तीज का यह कठिन व्रत हमें सिखाता है कि धैर्य, तपस्या और सच्ची श्रद्धा से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। मिट्टी की मूर्तियों की यह पूजा प्रकृति से हमारे जुड़ाव और ईश्वर के प्रति संपूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। इस वर्ष जब आप अपने हाथों से महादेव और गौरी की मूरत बनाएं, तो मन में केवल प्रेम और सेवा का भाव रखें। माता पार्वती आपके जीवन को अखंड सौभाग्य, समृद्धि और अटूट प्रेम से भर देंगी।
हैप्पी हरितालिका तीज!

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