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| सोमवार व्रत कथा और आरती |
सनातन धर्म में सोमवार का दिन देवों के देव महादेव को समर्पित है। भगवान शिव अत्यंत भोले हैं, इसलिए उन्हें 'भोलेनाथ' भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से सोमवार का व्रत रखते हैं, उनके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
आइए जानते हैं सोमवार व्रत का महत्व, भोलेनाथ की कृपा पाने के सरल उपाय, इसकी पौराणिक कथा और आरती।
1. सोमवार व्रत का महत्व और भोलेनाथ की कृपा
सोमवार का व्रत केवल धार्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति के लिए भी बेहद लाभकारी माना गया है। 'सोम' का एक अर्थ चंद्रमा भी होता है, और भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है। इसलिए, सोमवार का व्रत करने से कुंडली में चंद्र दोष दूर होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
भोलेनाथ की कृपा पाने के सरल नियम:
सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हों।घर के मंदिर में दीपक जलाकर भोलेनाथ और माता पार्वती के सामने व्रत का संकल्प लें।
पास के शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत (साबुत चावल) और चंदन अर्पित करें।
पूजा के दौरान "ॐ नमः शिवाय" या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
2. सोमवार व्रत की सरल कथा (Somvar Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक बेहद धनी साहूकार रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी। इस दुःख से वह हमेशा परेशान रहता था। पुत्र प्राप्ति के लिए वह हर सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा से शिव-पार्वती की पूजा करता था।
उसकी भक्ति देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, "हे प्रभु! यह साहूकार आपका सच्चा भक्त है, कृपया इसकी मनोकामना पूरी करें।"
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे पार्वती! इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है। इस साहूकार के भाग्य में पुत्र का सुख नहीं है।" लेकिन माता पार्वती के बार-बार अनुरोध करने पर भोलेनाथ ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान तो दे दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उस बालक की आयु केवल 12 वर्ष की होगी।
साहूकार यह सब सुन रहा था, लेकिन वह निराश नहीं हुआ और पहले की तरह ही सोमवार का व्रत करता रहा। कुछ समय बाद साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। जब बालक 11 वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे उसके मामा के साथ काशी पढ़ने के लिए भेज दिया। साहूकार ने मामा को रास्ते में जगह-जगह यज्ञ करने और ब्राह्मणों को भोजन कराने का आदेश दिया।
रास्ते में एक नगर में एक राजकुमारी का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से विवाह होना था, वह एक आंख से काना था। उसके पिता ने जब साहूकार के सुंदर बेटे को देखा, तो उन्होंने सोचा कि क्यों न इसे दूल्हा बनाकर शादी के फेरे करवा दिए जाएं और बाद में इसे धन देकर विदा कर देंगे। ऐसा ही किया गया, लेकिन साहूकार के बेटे ने राजकुमारी के दुपट्टे पर लिख दिया—"तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है, लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जा रहा है, वह काना है।" राजकुमारी ने जब यह पढ़ा, तो उसने उस काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया।
इसके बाद बालक अपने मामा के साथ काशी पहुंच गया। जब बालक ठीक 12 वर्ष का हुआ, तो उसी दिन उसने यज्ञ रखा। बालक की तबीयत खराब हो गई और वह कमरे के अंदर जाकर सो गया। कुछ ही देर में उसके प्राण पखेरू उड़ गए। मामा यह देखकर रोने लगे।
उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती वहां से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने रोने की आवाज सुनी तो उन्होंने शिव जी से उस बालक के प्राण दान करने की प्रार्थना की। माता पार्वती के आग्रह पर भोलेनाथ ने उस बालक को दोबारा जीवित कर दिया।
पढ़ाई पूरी करके जब बालक अपनी पत्नी (उसी राजकुमारी) के साथ अपने नगर लौटा, तो साहूकार और उसकी पत्नी बेहद खुश हुए। इस प्रकार, भगवान शिव की कृपा से साहूकार का वंश भी बच गया और उसे पुत्र वधु भी मिल गई। जो भी व्यक्ति इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं।
3. भगवान शिव की आरती (Shiv Ji Ki Aarti)
पूजा के अंत में आरती करना अनिवार्य माना जाता है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
चंदन मृगमद सोहे भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
नित उठ दर्शन पावत महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...
सोमवार का व्रत भोलेनाथ को प्रसन्न करने का सबसे सरल और अचूक माध्यम है। यदि आप पूरी श्रद्धा और बिना किसी स्वार्थ के महादेव की शरण में जाते हैं, तो वह आपकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। इस सोमवार से आप भी शिव भक्ति के इस पावन व्रत की शुरुआत कर सकते हैं।
हर हर महादेव!

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