शिव तांडव स्तोत्र पाठ की विधि और सभी 15 श्लोकों का अर्थ | Shiv Tandav Stotram Lyrics Meaning

  शिव तांडव स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसकी सटीक शास्त्रीय विधि और इसके दिव्य 15 श्लोकों का संपूर्ण हिंदी अनुवाद नीचे प्रस्तुत है। यह प्रामाणिक जानकारी आपकी आध्यात्मिक साधना को और अधिक गहरा बनाएगी।

🔱 शिव तांडव स्तोत्र पाठ की अचूक विधि और नियम
  • ब्रह्म मुहूर्त या प्रदोष काल: इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए सुबह 4:00 से 6:00 बजे (ब्रह्म मुहूर्त) या शाम को सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) का चयन करें।
  • आसन और दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए कुश (घास) या ऊनी कंबल के आसन का प्रयोग करें। जमीन पर सीधे न बैठें।
  • रुद्राक्ष की उपस्थिति: पाठ करते समय गले में रुद्राक्ष की माला धारण करना या सामने रखना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • ध्वनि का कंपन: इस स्तोत्र को मन के भीतर बुदबुदाने के बजाय स्पष्ट, ऊंचे और लयबद्ध स्वर में गाकर पढ़ें। इसके अक्षरों की ध्वनि तरंगें ही घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं।
  • शिवलिंग अभिषेक: यदि संभव हो, तो तांबे के लोटे से शिवलिंग पर जल या दूध की पतली धारा गिराते हुए इसका पाठ करें।
📖 शिव तांडव स्तोत्र: सभी 15 श्लोक और उनका हिंदी अर्थ
श्लोक 1
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवद्वमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥1॥
  • अर्थ: जिन महादेव की घनी जटा रूपी वन से बहती हुई गंगा जी की धाराएं उनके कंठ को पवित्र करती हैं, जिनके गले में विशाल सांपों की माला लटक रही है, और जो अपने डमरू से 'डम-डम' की तीव्र ध्वनि निकालते हुए प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे भगवान शिव हमारा कल्याण करें।
श्लोक 2
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥2॥
  • अर्थ: जिन शिव जी के जटाओं के गहरे भंवर में देव नदी गंगा की चंचल लहरें तेजी से घूम रही हैं, जिनके विशाल मस्तक पर 'धक-धक' करती हुई अग्नि की ज्वाला जल रही है, और जिन्होंने अपने मस्तक पर बाल-चंद्रमा धारण किया है, उन महादेव में मेरा प्रेम हर पल बढ़ता रहे।
श्लोक 3
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥3॥
  • अर्थ: जो पर्वतराज पुत्री माता पार्वती के विलासमय कटाक्षों के कारण आनंदित रहते हैं, जिनकी करुणा दृष्टि मात्र से भक्तों के जीवन की भयानक से भयानक विपत्तियां तुरंत थम जाती हैं, उन दिगंबर (आकाश रूपी वस्त्र वाले) शिव में मेरा मन सदैव आनंदित रहे।
श्लोक 4
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥4॥
  • अर्थ: जिनकी जटाओं में लिपटे नागों की पीली मणियों का प्रकाश चारों दिशाओं को केसर के लेप की तरह चमका रहा है, और जो मदमस्त हाथी की खाल का चमकीला वस्त्र धारण करते हैं, उन समस्त जीवों के स्वामी भूतनाथ में मेरा मन लीन रहे।
श्लोक 5
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥5॥
  • अर्थ: देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं के मस्तक झुकाने पर उनके मुकुट के फूलों के पराग से जिनके चरण कमल की वेदी सुशोभित होती है, जिन्होंने नागराज वासुकी से अपनी जटाओं को बांधा है, वे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले प्रभु मुझे शाश्वत समृद्धि और धन प्रदान करें।
श्लोक 6
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिंगभा निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥6॥
  • अर्थ: जिन्होंने अपने मस्तक की तीसरी आंख की अग्नि की चिंगारी से कामदेव को भस्म कर दिया था, जिन्हें देवराज इंद्र भी प्रणाम करते हैं, और जो अमृतमयी चंद्रमा की कला से सुशोभित हैं, वे महाकपाली शिव हमें जीवन की सभी सिद्धियां और ऐश्वर्य प्रदान करें।
श्लोक 7
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥7॥
  • अर्थ: जिनके चौड़े मस्तक पर 'धग-धग' जलती हुई अग्नि में कामदेव की आहुति दे दी गई थी, और जो माता पार्वती के वक्षस्थल पर सुंदर चित्रकारी करने वाले एकमात्र दिव्य कलाकार हैं, उन तीन आंखों वाले त्रिलोचन शिव में मेरी अटूट भक्ति बनी रहे।
श्लोक 8
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत् कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥8॥
  • अर्थ: जिनका कंठ अमावस्या की आधी रात के घने काले बादलों की तरह गहरा नीला है, जो अपने सिर पर गंगा जी को धारण करते हैं, जो गजराज का चर्म पहनते हैं, वे संसार का भार उठाने वाले कलाधारी शिव हमें सुख-समृद्धि दें।
श्लोक 9
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा वलम्बिबण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदानंधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे॥9॥
  • अर्थ: जिनका कंठ खिले हुए नीले कमल की सुंदर श्यामता जैसी आभा से सुशोभित है, जो कामदेव का नाश करने वाले, त्रिपुर का वध करने वाले, संसार के बंधनों को काटने वाले, राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले, गजासुर और अंधकासुर को मारने वाले तथा स्वयं यमराज (काल) के भी काल हैं, मैं उन मृत्युंजय शिव को भजता हूँ।
श्लोक 10
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदानंधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे॥10॥
  • अर्थ: जो संपूर्ण कल्याण की साक्षात मूर्ति माता पार्वती की कलाओं के मधुर रस का पान करने के लिए भँवरे के समान लालायित रहते हैं, और जो कामदेव, त्रिपुर, संसार बंधन, दक्ष यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और काल का अंत करने वाले हैं, मैं उन भगवान शिव की आराधना करता हूँ।
श्लोक 11
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥11॥
  • अर्थ: तांडव के समय तेजी से घूमते हुए सांपों की फुफकार से जिनके मस्तक की अग्नि और अधिक धधक उठती है, और जो 'धिमिद्-धिमिद्' बजते हुए विशाल मृदंग की मंगलकारी ध्वनि की ताल पर भयंकर तांडव नृत्य कर रहे हैं, उन परम प्रतापी शिव की जय हो।
श्लोक 12
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजे॥12॥
  • अर्थ: मैं कब उस अवस्था को प्राप्त करूँगा, जहाँ कठोर पत्थर और सुंदर बिछौने में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, एक तिनके और कमल जैसी आंखों वाली सुंदर स्त्री में, तथा साधारण प्रजा और राजा में समान भाव (समदृष्टि) रखते हुए परम शांत सदाशिव की निरंतर भक्ति कर सकूँगा?
श्लोक 13
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोचलोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥13॥
  • अर्थ: मैं कब गंगा जी के किनारे सुंदर गुफाओं में निवास करते हुए, अपने बुरे विचारों का त्याग कर, अपने मस्तक पर दोनों हाथ जोड़कर अंजलि बांधे, आंखों से प्रेमाश्रु बहाते हुए और शिव मन्त्र का जाप करते हुए परम आनंद और मोक्ष को प्राप्त करूँगा?
श्लोक 14
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥14॥
  • अर्थ: जो मनुष्य रावण द्वारा रचित इस सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, सुनता है या स्मरण करता है, वह सदा के लिए पवित्र हो जाता है। उसे साक्षात जगतगुरु भगवान शिव की अविचल भक्ति प्राप्त होती है। शिव चिंतन ही मनुष्य के सभी मोह-जाल और भ्रमों को नष्ट करने का एकमात्र मार्ग है।
श्लोक 15 (फलश्रुति)
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥15॥
  • अर्थ: जो व्यक्ति शाम के समय (प्रदोष काल में) भगवान शिव की पूजा के अंत में रावण द्वारा गाए गए इस शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करता है; भगवान भोलेनाथ उसे रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी (अथाह धन-सम्पदा) और यश प्रदान करते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

महामृत्युंजय मंत्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व: नियम और सही समय

हनुमान अष्टक का पाठ क्यों है शक्तिशाली? जानें इसके चमत्कारिक लाभ

सुबह उठकर हथेलियों को क्यों देखना चाहिए? जानें करदर्शन मंत्र का महत्व